बुधवार, 18 नवंबर 2009

प्रथम गणपतिजी के गुणगाना

प्रथम गणपतिजी के गुणगाना ।

प्रेम भाव से सेवा करना तज के अभिमान ॥ टेर ॥

अड़सठ तीरथ न्यारा न्यारा, गंगा जल ल्याना ।

चतुराई की चौकी बैठ कर, करते असनाना ॥ 1 ॥

सूंड सुंडाला, दूंद दूंदाला और सोहे काना ।

मुख मँ तो एक दन्त बिराजै, खूब सजै बाना ॥ 2 ॥

पारवती के पुत्र कहावो, शिव के मन माना ।

सब देवन मँ देव बड़े हो, पूजै अगवाना ॥ 3 ॥

सब मुनियन को शीश झुकाऊँ, दीज्यो बुध ज्ञान ।

भुल्या अक्षर मोय बताओ, नहीं तुमसे छाना ॥ 4 ॥

नाथ गुलाब मिल्या गुरु पूरा, भगवाँ है बाना।

भानीनाथ शरण सतगुरु की, सभा बीच आना ॥ 5 ॥

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